चलती बस में एक और दरिंदगी
4 अगस्त 2026 की रात। एक 16 साल की लड़की, मैनपुरी की रहने वाली, नोएडा में अपने कज़िन से मिलने निकली थी। तेज़ बारिश और
घुप्प अंधेरे में वह ग्रेटर नोएडा के पारी चौक पर गलती से उतर गई अकेली, अनजान सड़क पर, बारिश में भीगती हुई। वहीं से गुज़र रही
एक खाली स्लीपर बस को उसने रोका, इस उम्मीद में कि
सुरक्षित घर पहुंच जाएगी। ड्राइवर कुलदीप और कंडक्टर संदीप ने उसे नोएडा सेक्टर-63 तक लिफ्ट देने की बात कही और वह चढ़ गई, क्योंकि उस पल उसके पास कोई और चारा नहीं
था।
बस चलते ही
कंडक्टर छेड़छाड़ पर उतर आया। लड़की के मुताबिक, दोनों ने उसके साथ रेप किया और विरोध करने पर जान से मारने
की धमकी दी। बस में बर्थ के चारों ओर पर्दे लगे थे, कोई और सवारी नहीं थी यानी वह लड़की उस वक्त पूरी तरह अकेली, बेबस, और असहाय थी। बस 47 किलोमीटर तक चलती रही, पारी चौक से लेकर दिल्ली के कश्मीरी गेट तक, और उस पूरे सफर में उसकी चीखें किसी तक
नहीं पहुंचीं। आखिर में उसे रिंग रोड के किनारे फेंककर आरोपी फरार हो गए। हिम्मत
जुटाकर वह कश्मीरी गेट थाने पहुंची और आपबीती बताई।
पुलिस ने दोनों
आरोपियों को तिमारपुर से गिरफ्तार किया, बस ज़ब्त कर ली गई। POCSO और BNS की धारा 70(2) लगेगी, जिसमें उम्रकैद या
मौत की सज़ा तक का प्रावधान है। कागज़ पर यह एक "मज़बूत जवाब" जैसा लगता
है। पर ज़रा सोचिए एक 16 साल की बच्ची, जो सिर्फ अपने घर लौटना चाहती थी, उसे इस कीमत पर सुरक्षा तलाशनी पड़ी।
क्या यह घटना एक इत्तेफाक है, या एक ऐसे सिस्टम
का लगातार दोहराया जा रहा नतीजा है जो 14 साल में कुछ खास नहीं सीखा?
आंकड़े जो चीख-चीख कर बोलते हैं
NCRB की सबसे ताज़ा रिपोर्ट (2024 का डेटा, मई 2026 में जारी) के मुताबिक भारत में 29,536 रेप के मामले दर्ज हुए यानी औसतन हर दिन करीब 107 केस। सोचिए, जब तक आप यह लाइन पढ़ेंगे, कहीं न कहीं एक और महिला या बच्ची इस दर्द से गुज़र रही
होगी। राजस्थान सबसे आगे (4,871 केस), फिर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश। महिलाओं के खिलाफ कुल अपराध 4.4 लाख से ज़्यादा दर्ज हुए।
सबसे शर्मनाक
आंकड़ा यह है: कन्विक्शन रेट सिर्फ 22-24%। यानी हर चार आरोपियों में से करीब तीन
या तो अदालत से बरी हो जाते हैं या सालों तक केस लटका रहता है। देशभर की अदालतों
में 26 लाख से ज़्यादा महिला-अपराध के मामले पेंडिंग पड़े हैं। 2024 में सिर्फ 45,832 केसों में सज़ा हुई, जबकि 1,23,340 में आरोपी बरी हो गए। और ध्यान रहे यह सिर्फ 2024 का डेटा है, 2026 के पूरे साल के आंकड़े अभी आने बाकी हैं, क्योंकि NCRB की रिपोर्ट हमेशा डेढ़-दो साल पीछे चलती है।
इसका मतलब यह है
कि जिस बच्ची की कहानी हमने ऊपर पढ़ी, उसके जैसी लाखों लड़कियां और औरतें आज भी न्याय के इंतज़ार
में बैठी हैं कुछ महीनों से, कुछ सालों से। सवाल उठता है: जब कानून
पहले से इतना सख्त है, तो सज़ा की दर इतनी शर्मनाक क्यों है?
कानून सख्त, पर लागू करने वाला हाथ कमज़ोर
2012 के निर्भया केस के बाद पूरा देश उबल पड़ा
था। सड़कों पर लाखों लोग उतरे, मोमबत्तियां जलीं, संसद हिल गई। जस्टिस वर्मा कमेटी बनी, 2013 का क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट आया, सज़ाएं बढ़ीं, स्टॉकिंग और वॉयरिज्म जैसे नए अपराध
जोड़े गए। 2018 में कठुआ-उन्नाव जैसे मामलों के बाद 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के रेप में
मौत की सज़ा का प्रावधान जोड़ा गया। हर बार लगा कि अब बदलाव आएगा।
फिर अगस्त 2024 में कोलकाता के RG Kar अस्पताल में एक ट्रेनी डॉक्टर की ड्यूटी
के दौरान रेप और हत्या हुई फिर वही गुस्सा, फिर वही सड़कों पर उतरना, फिर वही मोमबत्तियां। नतीजे में मुख्य
आरोपी संजय रॉय को जनवरी 2025 में उम्रकैद हुई मौत की सज़ा नहीं, क्योंकि कोर्ट ने इसे "दुर्लभतम मामला" नहीं
माना। पीड़िता के माता-पिता आज तक कह रहे हैं कि उन्हें असली इंसाफ नहीं मिला, क्योंकि उन्हें शक है कि इस अपराध में और
लोग भी शामिल थे जिन पर आज तक मुकदमा तक नहीं चला। एक
बेटी खो देने के बाद भी माता-पिता को इंसाफ के लिए लड़ते रहना पड़ रहा है।
पश्चिम बंगाल
विधानसभा ने इसी केस के बाद उसी बेटी के नाम पर "अपराजिता बिल" पास किया जिसमें मौत की सज़ा और 21 दिन में जांच पूरी करने का वादा है। पर
यह बिल आज तक राष्ट्रपति की मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहा
है, क्योंकि यह केंद्रीय कानून में संशोधन
करता है। महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश के ऐसे ही बिल भी धूल फांक रहे हैं। सवाल है जब सरकारें पीड़िताओं के नाम पर कानून बनाकर संसद और राष्ट्रपति भवन के
दरवाज़े पर टिकाए बैठी हैं, तो असल में पीड़िताओं और उनके परिवारों
को इंसाफ का इंतज़ार आखिर कब तक करना होगा?
जब खुद अदालतें ही असंवेदनशील निकलें
सबसे परेशान करने
वाली बात यह है कि कभी-कभी समस्या पुलिस या सरकार से आगे बढ़कर खुद न्यायपालिका के
भीतर घुस जाती है। इसे समझने के लिए एक और घटना जाननी ज़रूरी है वह घटना जिस पर यह विवादित फैसला आया।
असली घटना क्या
थी: यह मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज ज़िले
का है, जो 2021 में हुआ था। एक 11 साल की बच्ची अपनी मां के साथ सड़क पर चल रही थी। दो लोगों पवन और आकाश ने उस पर हमला किया। उन्होंने बच्ची की छाती पकड़ी, उसके पायजामे की डोरी तोड़ी, और उसे पास के एक कल्वर्ट (सड़क के नीचे
बने पुलिया जैसे सुनसान ढांचे) के नीचे घसीटकर ले जाने की कोशिश की। गनीमत रही कि
बच्ची की चीख सुनकर आसपास के राहगीर दौड़ पड़े, जिससे दोनों आरोपी डरकर भाग गए। अगर उस वक्त कोई मदद के लिए
न पहुंचता, तो यह घटना शायद कहीं ज़्यादा भयानक मोड़
ले लेती। एक 11 साल की बच्ची, जो अपनी मां के साथ चल रही थी, उसके साथ यह सब हुआ सिर्फ इसलिए कि वह सड़क पर मौजूद थी।
इसी घटना पर
आधारित एक आपराधिक याचिका की सुनवाई करते हुए, मार्च 2025 में इलाहाबाद
हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने कहा कि छाती पकड़ना और पायजामे की
डोरी तोड़ना "रेप की कोशिश" (अटेम्प्ट टू रेप) नहीं माना जा सकता क्योंकि मामला अभी "तैयारी के
चरण" में ही था, और अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा
कि आरोपी इस चरण से आगे बढ़ चुके थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह आदेश
किसी जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि 4 महीने तक सोच-विचार के बाद, ठंडे दिमाग से लिखा गया था यानी यह कोई एक पल की चूक नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट को
खुद संज्ञान लेकर इस पर रोक लगानी पड़ी और जो शब्द इस्तेमाल हुए, वे बताते हैं कि मामला कितना गंभीर था:
जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने कहा कि यह फैसला "संवेदनशीलता की पूरी कमी" और "अमानवीय रवैया" दिखाता है। और यह अकेली घटना नहीं थी — सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि उसी
हाईकोर्ट के एक और जज ने एक अलग रेप केस में ज़मानत देते हुए कहा कि शिकायतकर्ता
ने खुद शराब पीकर आरोपी के घर जाकर "मुसीबत को न्योता दिया।" इससे पहले 2021 में बॉम्बे हाईकोर्ट का चर्चित
"स्किन-टू-स्किन" फैसला भी इसी राह पर चला था, जिसमें कहा गया था कि कपड़ों के ऊपर से
किया गया स्पर्श यौन उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं आता उसे भी सुप्रीम कोर्ट ने
पलटा था।
अगर हाईकोर्ट स्तर
पर, महीनों की सोच-विचार के बाद लिखे गए
फैसलों में भी एक 11 साल की बच्ची के दर्द को "तैयारी के
चरण" में सिमटा दिया जाए, तो सोचिए, थानों में और निचली अदालतों में, जहां न मीडिया की नज़र होती है न सुप्रीम
कोर्ट की निगरानी, वहां पीड़िताओं के साथ क्या होता होगा।
असली सवाल जो हर बार दफना दिए जाते हैं
निर्भया से लेकर
कोलकाता तक, और अब दिल्ली की इस सलीपर बस तक पैटर्न एक जैसा है: घटना होती है, गुस्सा फूटता है, कानून और सख्त कर दिया जाता है, टीवी चैनलों पर बहसें होती हैं, नेता संवेदना जताते हैं और फिर सब कुछ धीरे-धीरे शांत हो जाता है, जब तक अगली घटना सामने न आ जाए। जिन
चीज़ों में असली बदलाव चाहिए था पुलिस की ट्रेनिंग, फोरेंसिक लैब की क्षमता, फास्ट-ट्रैक कोर्ट में पर्याप्त जज, सार्वजनिक परिवहन की निगरानी, न्यायपालिका के भीतर संवेदनशीलता की
ट्रेनिंग उन पर निवेश और सुधार की रफ्तार कभी भी उतनी तेज़ नहीं रही जितनी कानून
बनाने की सुर्खियां बनती हैं।
हर बार एक नई
बच्ची, एक नई महिला, एक नया परिवार इस दर्द से गुज़रता है और हर बार हम वही सवाल पूछते हैं, वही वादे सुनते हैं, और फिर भूल जाते हैं। तो अब कुछ सवाल
आपके लिए, सोचने के लिए:
- अगर सज़ा की दर सिर्फ 22-24% है, तो क्या मौत की सज़ा जैसे कड़े प्रावधान असल में डर
पैदा करते हैं, या सिर्फ सरकारों को "हमने कुछ
किया" कहने का मौका देते हैं?
- जब कोई राज्य सरकार पीड़िता के नाम
पर कानून बनाती है, पर वह कानून सालों तक राष्ट्रपति की
मेज़ पर पड़ा रहता है तो क्या यह इंसाफ है, या सिर्फ राजनीतिक नाटक?
- अगर हाईकोर्ट के जज खुद पीड़िता को
दोष देने वाली भाषा इस्तेमाल कर सकते हैं, तो आम आदमी की मानसिकता बदलने की उम्मीद कैसे की जाए?
- हर बड़े रेप कांड के बाद सड़कों पर मोमबत्तियां जलती हैं, टीवी पर बहसें होती हैं फिर कुछ हफ्तों बाद सब भूल क्यों
जाते हैं?
- क्या हमें सच में और कड़े कानूनों
की ज़रूरत है, या उन कानूनों को ईमानदारी से लागू
करने वाले पुलिस और अदालत तंत्र की?
- और सबसे ज़रूरी — अगली घटना होने से पहले, इस बार हम कुछ बदलेंगे, या सिर्फ एक और हैशटैग ट्रेंड
कराएंगे?

